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Tenali Rama ki kahani – Tenali Raman stories in Hindi

The Best Tenali Raman stories in Hindi – achi kahaniyan

Learn about the Tenali Ramakrishna story in Hindi language. Who was Tenali Rama? Why was Tenali Ramakrishna so famous in Andhra Pradesh and why are Tenali Ramakrishna stories in Hindi so popular? In this section, we are going to learn about the famous story behind the great Tenali Ramakrishna in Hindi. After that we can read many Tenali Ramakrishna stories in Hindi with morals.

Tenali Raman Stories in Hindi
Tenali Raman Stories in Hindi
  1. About Tenali Ramakrishna in Hindi – तेनाली राम के बारे में जानें।
  2. Tenali Raman stories in Hindi – तेनाली रमन की कहानियाँ हिंदी में
  3. Tenali Rama ki kahani – achi kahaniyan – तेनाली रमणी की कहानियां
  4. tenali rama story in hindi with moral
  5. Tenali Ramakrishna stories in Hindi PDF

 

Learn About Tenali Rama Story in Hindi

So who is Tenali Ramakrishna and where can I learn about tenali ramakrishna in hindi? Why are Tenali Raman stories in Hindi so famous? Is Tenali Raman a real person or just a story? Tenali Rama was a real historical person and you can read about tenali rama in hindi below.

  • तेनाली रमन का जन्म नाम – गरलापति रामकृष्ण
  • तेनाली रमन की जन्म तिथि – 1480
  • तेनाली रमन का गृहनगर – आंध्र प्रदेश में तेनाली
  • जाति – ब्राह्मण
  • मातृभाषा – तेलुगु
  • तेनाली रमन की मृत्यु – 1528 में तेनाली रामकृष्ण की मृत्यु हो गईवह 48 वर्ष के थे
  • तेनाली रमन की मृत्यु कैसे हुई? तेनाली रामकृष्ण को सांप ने काट लिया

 

Tenali rama ki kahani – Tenali Rama story in Hindi

Now that we have learnt about tenali ramakrishna in hindi and his full history, let us now read some very short stories of Tenali in Hindi. You can find some good Tenali Ramakrishna stories in Hindi in the below section. Tenaliram ki kahani, achi kahaniyan!

 

About Tenali Ramakrishna in Hindi  – तेनालीराम

Before you start reading all the Tenali Raman stories in Hindi, you should first learn about Tenali Raman. This is a small excerpt about the great Tenali Raman and his legendary stories in Hindi. Let us read about Tenali Rama in Hindi before starting to read the collection of Tenali Rama stories in Hindi with moral.

 

तेनालीराम का जन्म सोलहवीं शताब्दी में भारत के आन्ध्रप्रदेश राज्य के गुन्टूर जिले के गाँव – गरलापाडु में एक तेलुगू ब्राह्मण परिवार में हुआ। वह कवि थे, व तेलुगू साहित्य के महान ज्ञानी थे। अपने वाक चातुर्य के कारण वह काफी प्रख्यात थे। और उन्हे “विकट कवि” के उपनाम से संबोधित किया जाता था। जब महाराज कृष्णदेव राय विजयनगर की राजगद्दी पर विराजमान थे, तब तेनालीराम उनके दरबार में एक हास्य कवि और मंत्री सहायक की भूमिका में उपस्थित हुआ करते थे। तेनालीराम राज्य से जुड़ी विकट परेशानीयों से उभरने के लिए महाराज की मदद करते थे। उनकी बुद्धि चातुर्य और ज्ञान बोध से जुड़ी कई कहानियाँ बहुत ही लोकप्रिय हैं ।

 

अच्छा, तू माँ से भी मजाक करेगा? – Tenali Ramakrishna and Maa Durga in Hindi

This is the first story among the great collection of Tenali Raman stories in Hindi. In this wonderful kahani, Tenali Ramakrishna prays to goddess Maa Durga and proves his intelligence to her. Tenali Rama makes her very happy and gets her blessing to become an intelligent poet. Let us now start reading the Tenali Rama stories in Hindi.

Tenali Ramakrishna and Maa Durga in Hindi
Tenali Ramakrishna and Maa Durga in Hindi

कोई छह सौ वर्ष पुरानी बात है। विजयनगर का साम्राज्य सारी दुनिया में प्रसिद्ध था। उन दिनों भारत पर विदेशी आक्रमणों के कारण प्रजा बड़ी मुश्किलों में थी। हर जगह लोगों के दिलों में दुख-चिंता और गहरी उधेड़-बुन थी। पर विजयनगर के प्रतापी राजा कृष्णदेव राय की कुशल शासन-व्यवस्था, न्याय-प्रियता और प्रजा-वत्सलता के कारण वहाँ प्रजा बहुत खुश थी। राजा कृष्णदेव राय ने प्रजा में मेहनत और सद्गुणों के साथ-साथ अपनी संस्कृति के लिए स्वाभिमान का भाव पैदा कर दिया था, इसलिए विजयनगर की ओर देखने की हिम्मत किसी विदेशी आक्रांता की नहीं थी। विदेशी आक्रमणों की आँदी के आगे विजयनगर एक मजबूत चट्टान की तरह खड़ा था। साथ ही वहाँ लोग साहित्य और कलाओं से प्रेम करने वाले तथा परिहास-प्रिय थे।

 

उन्हीं दिनों की बात है, विजयनगर के तेनाली गाँव में एक बड़ा बुद्धिमान और प्रतिभासंपन्न किशोर था। उसका नाम था रामलिंगम। वह बहुत हँसोड़ और हाजिरजवाब था। उसकी हास्यपूर्ण बातें और मजाक तेनाली गाँव के लोगों को खूब आनंदित करते थे। रामलिंगम खुद ज्यादा हँसता नहीं था, पर धीरे से कोई ऐसी चतुराई की बात कहता कि सुनने वाले हँसते-हँसते लोटपोट हो जाते। उसकी बातों में छिपा हुआ व्यंग्य और बड़ी सूझ-बूझ होती। इसलिए वह जिसका मजाक उड़ाता, वह शख्स भी द्वेष भूलकर औरों के साथ खिलखिलाकर हँसने लगता था। यहाँ तक कि अकसर राह चलते लोग भी रामलिंगम की कोई चतुराई की बात सुनकर हँसते-हँसते लोटपोट हो जाते।

अब तो गाँव के लोग कहने लगे थे, ‘‘बड़ा अद्भुत है यह बालक। हमें तो लगता है कि यह रोते हुए लोगों को भी हँसा सकता है। रामलिंगम कहता, ‘‘पता नहीं, रोते हुए लोगों को हँसा सकता हूँ कि नहीं, पर सोते हुए लोगों को जरूर सकता हूँ।’’ सुनकर आसपास खड़े लोग ठठाकर हँसने लगे।

यहाँ तक कि तेनाली गाँव में जो लोग बाहर से आते, उन्हें भी गाँव के लोग रामलिंगम के अजब-अजब किस्से और कारनामे सुनाया करते थे। सुनकर वे भी खिलखिलाकर हँसने लगते थे और कहते, ‘‘तब तो यह रामलिंगम सचमुच अद्भुत है। हमें तो लगता है कि यह पत्थरों को भी हँसा सकता है!’’

 

गाँव के एक बुजुर्ग ने कहा, ‘‘भाई, हमें तो लगता है कि यह घूमने के लिए पास के जंगल में जाता है, तो वहाँ के पेड़-पौधे और फूल-पत्ते भी इसे देखकर जरूर हँस पड़ते होंगे।’’

एक बार की बात है, रामलिंगम जंगल में घूमता हुआ माँ दुर्गा के एक प्राचीन मंदिर में गया। उस मंदिर की मान्यता थी और दूर-दूर से लोग वहाँ माँ दुर्गा का दर्शन करने आया करते थे।

 

रामलिंगम भीतर गया तो माँ दुर्गा की अद्भुत मूर्ति देखकर मुग्ध रह गया। माँ के मुख-मंडल से प्रकाश फूट रहा था। रामलिंगम की मानो समाधि लग गई। फिर उसने दुर्गा माता को प्रणाम किया और चलने लगा। तभी अचानक उसके मन में एक बात अटक गई। माँ दुर्गा के चार मुख थे, आठ भुजाएँ थीं। इसी पर उसका ध्यान गया और अगले ही पल उसकी बड़े जोर से हँसी छूट गई।

 

देखकर माँ दुर्गा को बड़ा कौतुक हुआ। वे उसी समय मूर्ति से बाहर निकलकर आईं और रामलिंगम के आगे प्रकट हो गईं। बोलीं, ‘‘बालक, तू हँसता क्यों है ?’’ रामलिंगम माँ दुर्गा को साक्षात सामने देखकर एक पल के लिए तो सहम गया। पर फिर हँसते हुए बोला, ‘‘क्षमा करें माँ, एक बात याद आ गई, इसीलिए हँस रहा हूँ।’’

‘‘कौन सी बात ? बता तो भला !’’ माँ दुर्गा ने पूछा।

 

इस पर रामलिंगम ने हँसते-हँसते जवाब दिया, ‘‘माँ, मेरी तो सिर्फ एक ही नाक है पर जब जुकाम हो जाता है तो मुझे बड़ी मुसीबत आती है। आपके तो चार-चार मुख हैं और भुजाएँ भी आठ हैं। तो जब जुकाम हो जाता होगा, तो आपको और भी ज्यादा मुसीबत…!’’ रामलिंगम की बात पूरी होने से पहले ही माँ दुर्गा खिलखिलाकर हँस पड़ीं। बोलीं, ‘हट पगले, तू माँ से भी मजाक करता है!’’

फिर हँसते हुए उन्होंने कहा, ‘‘पर आज मैं समझ गई हूँ कि तुझमें हास्य की बड़ी अनोखी सिद्धि है। अपनी इसी सूझ-बूझ और हास्य के बल पर तू नाम कमाएगा और बड़े-बड़े काम करेगा। पर एक बात याद रख, अपनी इस हास्य-वृत्ति का किसी को दुख देने के लिए प्रयोग मत करना। सबको हँसाना और दूसरों की भलाई के काम करना। जा, तू राजा कृष्णदेव राय के दरबार में जा। वही तेरी प्रतिभा का पूरा सम्मान करेंगे।’’

 

उस दिन रामलिंगम दुर्गा माँ के प्राचीन मंदिर से लौटा, तो उसका मन बड़ा हल्का-फुल्का था। लौटकर उसने माँ को यह अनोखा प्रसंग बताया। सुनकर माँ चकित रह गईं।
और फिर होते-होते पूरे तेनाली गाँव में यह बात फैल गई कि रामलिंगम को दुर्गा माँ ने बड़ा अद्भुत वरदान दिया है। यह बड़ा नाम कमाएगा और बड़े-बड़े काम करेगा। उसके साथ ही साथ तेनाली गाँव का नाम भी ऊँचा होगा।

 

 

हीरों का सच – Tenali Raman Stories in Hindi – The stolen diamonds

This is the second story among this funny and collection of witty Tenali Raman stories in Hindi. In this short kahani, a merchant steals two diamonds and says that he is innocent. Even the servants say exactly the same and support the Merchant. Tenali Ramakrishna proves his intelligence and wit by trapping the merchant red handed and retrieves the diamonds and also the merchant gets punished. Let us now start reading this Tenali Rama story in Hindi.

Tenali Ramakrishna and the stolen diamonds
Tenali Ramakrishna and the stolen diamonds

एक बार राजा कृष्णदेवराय दरबार में बैठे मंत्रियों के साथ विचार विमर्श कर रहे थे कि तभी एक व्यक्ति उनके सामने आकर कहने लगा,”महाराज मेरे साथ न्याय करें। मेरे मालिक ने मुझे धोखा दिया है। इतना सुनते ही महाराज ने उससे पूछा, तुम कौन हो? और तुम्हारे साथ क्या हुआ है।”

“अन्नदाता मेरा नाम नामदेव है। कल मैं अपने मालिक के साथ किसी काम से एक गाँव में जा रहा था। गर्मी की वजह से चलते-चलते हम थक गए और पास में स्थित एक मंदिर की छाया में बैठ गए। तभी मेरी नज़र एक लाल रंग की थैली पर पड़ी जो की मंदिर के एक कोने में पड़ी हुई थी। मालिक की आज्ञा लेकर मैंने वो थैली उठा ली उसे खोलने पर पता चला कि उसके अंदर बेर के आकार के दो हीरे चमक रहे थे। हीरे मंदिर में पाए गए थे इसलिए उन पर राज्य का अधिकार था। परन्तु मेरे मालिक ने मुझसे ये बात किसी को भी बताने से मना कर दिया और कहा कि हम दोनों इसमें से एक-एक हीरा रख लेंगे। मैं अपने मालिक की गुलामी से परेशान था इसलिए मैं अपना काम करना चाहता था जिसके कारण मेरे मन में लालच आ गया।हवेली आते ही मालिक ने हीरे देने से साफ़ इनकार कर दिया।यही कारण है कि मुझे इन्साफ चाहिए।

महाराज ने तुरंत कोतवाल को भेजकर नामदेव के मालिक को महल में पेश होने का आदेश दिया। नामदेव के मालिक को जल्द ही राजा के सामने लाया गया । राजा ने उससे हीरों के बारे में पूछा तो वह बोला, “महाराज ये बात सच है कि मंदिर में हीरे मिले थे लेकिन मैंने वो हीरे नामदेव को देकर उन्हें राजकोष में जमा करने को कहा था। जब वह वापस लौटा तो मैंने उससे राजकोष की रशीद मांगी तो वह आनाकानी करने लगा। मैंने जब इसे धमकाया तो ये आपके पास आकर मनगढ़त कहानी सुनाने लगा।” “अच्छा, तो ये बात है।” महाराज ने कुछ सोचते हुए कहा – “क्या तुम्हारे पास इस बात का कोई सबूत है कि तुम सच बोल रहे हो?” “अन्नदाता अगर आपको मेरी बात पर यकीं नहीं तो आप मेरे दूसरे तीनों नौकरों से पूछ सकते हो। वो उस वक़्त वहीं थे ।”

उसके बाद तीनों नौकरों को राजा के सामने लाया गया। तीनों ने नामदेव के खिलाफ गवाही दी। महारज तीनों नौकरों और मालिक को वही बिठा कर अपने विश्राम कक्ष में चले गए और सेनापति.तेनालीराम, महामंत्री को भी इस विषय में बात करने के लिया वहाँ बुलवा लिया। उनके पहुँचने पर महाराज ने महामंत्री से पूछा, “आपको क्या लगता है ? क्या नामदेव झूठ बोल रहा है?”

“जी महाराज! नामदेव ही झूठा है। उसके मन में लालच आ गया होगा और उसने हीरे अपने पास ही रख लिए होंगे।” सेनापति ने गवाहों को झूठा बताया। उसके हिसाब से नामदेव सच बोल रहा था। तेनालीराम चुपचाप खड़ा सब की बातें सुन रहा था। तब महाराज ने उसकी ओर देखते हुए उसकी राय मांगी। तेनालीराम बोला , “महाराज कौन झूठा है और कौन सच्चा इस बात का अभी पता लग जायेगा परन्तु आप लोगों को कुछ समय के लिए पर्दे के पीछे छुपना होगा।” महाराज इस बात से सहमत हो गए क्योंकि वो जल्दी से जल्दी इस मसले को सुलझाना चाहते थे इसीलिए पर्दे के पीछे जाकर छुप गए।महामंत्री और सेनापति मुंह सिकोड़ते हुए पर्दे के पीछे चले गए।

अब विश्राम कक्ष में केवल तेनालीराम ही दिखाई दे रहा था। अब उसने सेवक से कहकर पहले गवाह को बुलाया। गवाह के आने पर तेनालीराम ने पूछा,“क्या तुम्हारे मालिक ने तुम्हारे सामने नामदेव को हीरे दिए थे।”

“जी हाँ।”

फिर तो तुम्हें हीरे के रंग और आकार के बारे में भी पता होगा। तेनालीराम ने एक कागज़ और कलम गवाह के सामने करते हुए उससे कहा लो मुझे इस पर हीरे का चित्र बनाकर दिखाओ । इतना सुनते ही उसकी सिट्टी -पिट्टी गुल हो गयी और बोला,“मैंने हीरे नहीं देखे क्योंकि वो लाल रंग की थैली में थे।” “अच्छा अब चुपचाप वहाँ जाकर खड़े हो जाओ ।” अब दूसरे गवाह को बुलाकर उससे भी यही प्रश्न पूछा गया।उसने हीरो के रंग के बारे में बताकर कागज़ पर दो गोल -गोल आकृतियाँ बनाकर अपनी बात साबित की। फिर उसे भी पहले गवाह के पास खड़ा कर दिया गया और तीसरे गवाह को बुलाया गया।

उसने बताया कि हीरे भोजपत्र की थैली में थे। इस वजह से वह उन्हें देख नहीं पाया। इतना सुनते ही महाराज पर्दे के पीछे से सामने आ गए ।महाराज को देखते ही तीनों घबरा गए और समझ गए कि अब सच बोलने में ही उनकी भलाई है। तीनों महाराज के पैरों को पकड़कर माफ़ी मांगने लगे और बोले हमें झूठ बोलने के लिए हमारे मालिक ने धमकाया था और नौकरी से निकालने की धमकी दी थी इसीलिए हमें झूठ बोलना पड़ा। महाराज ने तुरंत मालिक के घर की तालाशी के आदेश दे दिए। तालाशी लेने पर दोनों हीरे बरामद कर लिए गए। सजा के तौर पर मालिक को दस हज़ार स्वर्ण मुद्राएं नामदेव को देनी पड़ी और बीस हज़ार स्वर्ण मुद्राएं जुर्माने के तौर पर भरनी पड़ी जबकि बरामद हुए दोनों हीरे राजकोष में जमा कर लिए गए। इस प्रकार तेनालीराम की मदद से महाराज ने नामदेव के हक में फैसला सुनाया।

 

Moral of the Tenali Rama story: कहानी की शिक्षा: झूठ मत बोलो।

 

 

ब्राह्मण किसकी पूजा करे – Tenaliram ki kahani – The intelligent question

Thanks for reading two Tenali Ramakrishna stories in Hindi. This is the third story among this witty collection of Tenali Raman stories in Hindi. In this short Tenaliram ki kahani, Tenali Ramakrishna and King Krishnadevaraya were having a discussion in the court and he asks a very intelligent question. Learn how the famous Tenali Raman answers this question. Let us now start reading this Tenali Rama ki kahani.

Tenali Raman Stories in Hindi
Tenali Raman Stories in Hindi

एक दिन महाराज कृष्णदेव राय ने कहा ‘‘सभी दरबारी तथा मंत्रीगणों को यह आभास तो हो ही गया होगा कि आज दरबार में कोई विशेष कार्य नहीं और ईश्वर की कृपा से किसी की कोई समस्या भी हमारे सम्मुख नहीं। अतः क्यों न किसी विषय पर चर्चा की जाए।
क्या आप जैसे योग्य मंत्रियों व दरबारियों में से कोई सुझा सकता है ऐसा विषय, जिस पर चर्चा कराई जा सके ।’’

 

तभी तेनालीराम बोला, ‘‘महाराज, विषय का निर्णय आप ही करें तो अच्छा होगा।’’
महाराज ने कुछ सोचा और फिर बोले, ‘‘जैसा कि आप सभी जानते हैं कि क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र-तीनों वर्ग ब्राह्मण को पूजनीय मानें ?’’

 

सभी दरबारियों व मन्त्रियों को महाराज का यह प्रश्न बेहद सरल प्रतीत हुआ। ‘‘इसमें कठिनाई क्या है महाराज ? ब्राह्मण गाय को पवित्र मानते हैं… गाय जो कामधेनु का प्रतीक है।’’ एक मंत्री ने उत्तर दिया।

दरबार में उपस्थित सभी लोग उससे सहमत लगे।

तभी महाराज बोले, ‘‘तेनालीराम, क्या तुम भी इस उत्तर से संतुष्ट हो या तुम्हारी कुछ अगल राय है।’’

तेनालीराम हाथ जोड़ते हुए विनम्र भाव से बोला, ‘‘महाराज ! गाय को तो सभी पवित्र मानते हैं, चाहे मानव हो या देवता। और ऐसा मानने वाला मैं अकेला नहीं, हमारे विद्वान की राय भी कुछ ऐसी ही है।’’

 

‘‘यदि ऐसा है तो ब्राह्मण गौ-चर्म (गाय की खाल) से बने जूते-चप्पल क्यों पहनते हैं ?’’ महाराज ने फिर पूछा। दरबार में चहुं ओर चुप्पी छा गई।

दरअसल महाराज ने जो कुछ भी कहा था, वह बिल्कुल सच था। इस प्रश्न का उत्तर किसी के पास न था। सबको चुप देख महाराज ने घोषणा की जो भी उनके इस प्रश्न का संतोषजनक उत्तर देगा, उसे एक हजार स्वर्ण मुद्राएं पुरस्कार स्वरूप दी जाएंगी।

हजार स्वर्ण मुद्राओं का पुरस्कार दरबार में उपस्थित हर कोई लेना चाहता था लेकिन प्रश्न का उत्तर कोई नहीं जानता था।

 

सभी को चुप बैठा देख तेनालीराम अपने आसन से उठते हुए बोला, ‘‘महाराज ! ब्राह्मण के चरण (पैर) बेहद पवित्र माने जाते हैं। उतने ही पवित्र, जितना कि किसी तीर्थ धाम की यात्रा। अतः गौ-चर्म से बने जूते-चप्पल पहनने से गायों को मोक्ष मिल जाता है।’’

‘‘गलत तो हर हाल में गलत है।’’ महाराज बोले, ‘‘गौ-चर्म से बने जूते-चप्पल पहनना जायज नहीं कहा जा सकता, फिर चाहे पहनने वाला ब्राह्मण हो या किसी अन्य वर्ग का।
लेकिन मुझे खुशी इस बात की है कि तेनालीराम ने उत्तर देने का साहस तो किया। चतुराई भरा उसका उत्तर उसे हजार स्वर्ण मुद्राएं दिलाने के लिए काफी है।’’

 

 

अन्तिम इच्छा Tenaliram ki kahani – Training the horse!

Thanks for reading two Tenali Ramakrishna stories in Hindi. This is the third story among this witty collection of Tenali Raman stories in Hindi. In this short Tenaliram ki kahani, Tenali Ramakrishna and King Krishnadevaraya were having a discussion in the court and he asks a very intelligent question. Learn how the famous Tenali Raman answers this question. Let us now start reading this Tenali Rama ki kahani.

Tenaliram ki kahani
Tenaliram ki kahani

विजयनगर के ब्राह्मण बड़े ही लालची थे। वे हमेशा किसी न किसी बहाने राजा से धन वसूल करते थे। राजा की उदारता का अनुचित लाभ उठाना उनका परम कर्तव्य था। एक दिन राजा कृष्णदेव राय ने उनसे कहा, ‘‘मरते समय मेरी मां ने आम खाने की इच्छा व्यक्त की थी जो उस समय पूरी नहीं की जा सकी थी। क्या अब ऐसा कुछ हो सकता है, जिससे उसकी आत्मा को शांति मिले ?’’

‘‘महाराज, यदि आप एक सौ आठ ब्राह्मणों को सोने का एक-एक आम भेंट कर दें तो आपकी मां की आत्मा को अवश्य शांति मिल जाएगी। ब्राह्मणों को दिया दान मृतात्मा तक अपने आप पहुंच जाता है।’’ ब्राह्मणों ने कहा।

राजा कृष्णदेव राय ने सोने के एक सौ आठ आम दान कर दिए। ब्राह्मणों की मौज हो गई उन आमों को पाकर।

तेनाली राम को ब्राह्मणों के इस लालच पर बहुत क्रोध आया। वह उन्हें सबक सिखाने की ताक में रहने लगा।

जब तेनाली राम की मां की मृत्यु हुई तो एक महीने के बाद उसने ब्राह्मणों को अपने घर आने का न्योता दिया कि वह भी मां की आत्मा की शान्ति के लिए कुछ करना चाहता है।

खाने-पीने और बढ़िया माल पाने के लोभ में एक सौ आठ ब्राह्मण तेनाली राम के घर जमा हुए। जब सब आसनों पर बैठ गए तो तेनाली राम ने दरवाजे बन्द कर लिए और अपने नौकरों से कहा, ‘‘जाओ, लोहे की गरम-गरम सलाखें लेकर आओ और इन ब्राह्मणों के शरीर पर दागो।’’
ब्राह्मणों ने सुना तो उनमें चीख पुकार मच गई। सब उठकर दरवाजों की ओर भागे। लेकिन नौकरों ने उन्हें पकड़ लिया और एक-एक बार सभी को गरम सलाखें दागी गईं। बात राजा तक पहुंची। वह स्वयं आए और ब्राह्मणों को बचाया।

क्रोध में उन्होंने पूछा, ‘‘यह क्या हरकत है, तेनाली राम ?’’

तेनाली राम ने उत्तर दिया, ‘‘महाराज मेरी मां को जोड़ों के दर्द की बीमारी थी। मरते समय उनको बहुत तेज दर्द था। उन्होंने अंतिम समय में यह इच्छा प्रकट की थी कि दर्द के स्थान पर लोहे की गरम सलाखें दागी जाएं ताकि वह दर्द से मुक्तिपाकर चैन से प्राण त्याग सकें। उस समय उनकी यह इच्छा पूरी नहीं की जा सकी। इसीलिए ब्राह्मणों को सलाखें दागनी पड़ीं।’’
राजा हंस पड़े। ब्राह्मणों के सिर शर्म से झुक गए।

 

 

अन्तिम इच्छा – Tenali Rama Story in Hindi – The greedy brahmins

This is one of the many more great and witty Tenali Rama story in Hindi. In this story, some greedy Brahmins try to cheat Raja Krishnadevaraya and make a lot of money from him. Tenali Ramakrishna teaches the punditjis a lesson.

विजयनगर के ब्राह्मण बड़े ही लालची थे। वे हमेशा किसी न किसी बहाने राजा से धन वसूल करते थे। राजा की उदारता का अनुचित लाभ उठाना उनका परम कर्तव्य था। एक दिन राजा कृष्णदेव राय ने उनसे कहा, ‘‘मरते समय मेरी मां ने आम खाने की इच्छा व्यक्त की थी जो उस समय पूरी नहीं की जा सकी थी। क्या अब ऐसा कुछ हो सकता है, जिससे उसकी आत्मा को शांति मिले?’’

‘‘महाराज, यदि आप एक सौ आठ ब्राह्मणों को सोने का एक-एक आम भेंट कर दें तो आपकी मां की आत्मा को अवश्य शांति मिल जाएगी। ब्राह्मणों को दिया दान मृतात्मा तक अपने आप पहुंच जाता है।’’ ब्राह्मणों ने कहा।

राजा कृष्णदेव राय ने सोने के एक सौ आठ आम दान कर दिए। ब्राह्मणों की मौज हो गई उन आमों को पाकर।

तेनाली राम को ब्राह्मणों के इस लालच पर बहुत क्रोध आया। वह उन्हें सबक सिखाने की ताक में रहने लगा।

जब तेनाली राम की मां की मृत्यु हुई तो एक महीने के बाद उसने ब्राह्मणों को अपने घर आने का न्योता दिया कि वह भी मां की आत्मा की शान्ति के लिए कुछ करना चाहता है।

खाने-पीने और बढ़िया माल पाने के लोभ में एक सौ आठ ब्राह्मण तेनाली राम के घर जमा हुए। जब सब आसनों पर बैठ गए तो तेनाली राम ने दरवाजे बन्द कर लिए और अपने नौकरों से कहा, ‘‘जाओ, लोहे की गरम-गरम सलाखें लेकर आओ और इन ब्राह्मणों के शरीर पर दागो।’’
ब्राह्मणों ने सुना तो उनमें चीख पुकार मच गई। सब उठकर दरवाजों की ओर भागे। लेकिन नौकरों ने उन्हें पकड़ लिया और एक-एक बार सभी को गरम सलाखें दागी गईं। बात राजा तक पहुंची। वह स्वयं आए और ब्राह्मणों को बचाया।

क्रोध में उन्होंने पूछा, ‘‘यह क्या हरकत है, तेनाली राम ?’’

तेनाली राम ने उत्तर दिया, ‘‘महाराज मेरी मां को जोड़ों के दर्द की बीमारी थी। मरते समय उनको बहुत तेज दर्द था। उन्होंने अंतिम समय में यह इच्छा प्रकट की थी कि दर्द के स्थान पर लोहे की गरम सलाखें दागी जाएं ताकि वह दर्द से मुक्तिपाकर चैन से प्राण त्याग सकें। उस समय उनकी यह इच्छा पूरी नहीं की जा सकी। इसीलिए ब्राह्मणों को सलाखें दागनी पड़ीं।’’
राजा हंस पड़े। ब्राह्मणों के सिर शर्म से झुक गए।

 

Moral of the Tenali Rama story: कहानी की शिक्षा: लालची मत बनो।

 

 

लाल मोर – Tenali Rama story in Hindi –  The red peacock

There is no end to the greatness and the wit of Vikatakavi Tenali Raman Stories in Hindi. In this story, a very greedy courtier cheats Raja Krishnadevaraya by painting a peacock red and telling him that it is very rare. Raja Krishnadevaraya pays him a lot of money. Tenali Ramakrishna catches him red handed by finding out the truth and informing the king. Let us now start reading this Tenali Rama story in Hindi.

Tenaliram ki kahani with red peacock
Tenaliram ki kahani with red peacock

विजयनगर के राजा कृष्णदेव राय को अद्भुत व विलक्षण चीजें संग्रह करने का बहुत शौक था।
हर दरबारी उन्हें खुश रखने के लिए ऐसी ही दुर्लभ वस्तुओं की खोज में रहता था ताकि वह चीज महाराज को देकर उनका शुभचिंतक बन सके तथा रुपये भी ऐंठ सके।

एक बार एक दरबारी ने एक अनोखी चाल चली। उसने एक मोर को रंगों के एक विशेषज्ञ से लाल रंगवा लिया और उस लाल मोर को लेकर वह सीधा राजा कृष्णदेव राय के दरबार में पहुंचा और राजा से बोला-‘‘महाराज ! मैंने मध्य प्रदेश के घने जंगलों से आपके लिए एक अद्भुत व अनोखा मोर मंगाया है।’’

राजा कृष्णदेव राय ने उस मोर को बड़े गौर से देखा। उन्हें बड़ा ताज्जुब हो रहा था…‘‘लाल मोर…वास्तव में आपने हमारे लिए अद्भुत चीज मंगाई है। हम इसे राष्ट्रीय उद्यान में बड़ी हिफाजत से रखवाएंगे। अच्छा…यह तो बताओ कि इस मोर को मंगाने में तुम्हें कितना रुपया खर्च करना पड़ा ?’’

दरबारी ने अपनी प्रशंसा सुनी तो वह प्रसन्न हो उठा। बड़े ही विनम्र भाव से वह राजा से बोला, ‘‘महाराज, आपके लिए यह अनोखी वस्तु लाने के लिए मैंने अपने दो सेवक पूरे देश की यात्रा पर भेज रखे थे। वे वर्षों तक किसी अद्भुत वस्तु की खोज में लगे रहे। तब कहीं जाकर, मध्य प्रदेश के जंगलों में यह अनोखा लाल रंग का मोर मिला। मैंने अपने उन सेवकों पर करीब पच्चीस हजार रुपये खर्च किये हैं।’’

उस दरबारी की बात सुनकर राजा कृष्णदेव राय ने तुरन्त मंत्री को आज्ञा दी, ‘‘मंत्री जी, इन सज्जन को पच्चीस हजार रुपये राज-कोश से दे दिए जाएं।’’

मंत्री को यह आज्ञा देकर राजा ने दोबारा उस दरबारी से कहा, ‘‘यह तो आपको वह रुपया दिया जाता है, जो आपने खर्च किया है। इसके अलावा एक सप्ताह बाद आपको उचित पुरस्कार भी दिया जाएगा।’’
दरबारी को भला और क्या चाहिए था ? वह तेनाली राम की ओर कुटिल भाव से देखकर मुस्कराने लगा।

तेनाली राम उसके मुस्कराने का मतलब समझ गया, लेकिन समय को देखते हुए उसने चुप रहना ही उचित समझा।

तेनाली राम यह भी समझ गया कि लाल रंग का मोर किसी भी देश में नहीं होता। कहीं भी नहीं पाया जाता।

उसे लगा, यह सब अवश्य ही इस दरबारी की कोई चाल है।

बस फिर क्या था। तेनाली राम ने दूसरे ही दिन उस रंग विशेषज्ञ को खोज निकाला जिसने लाल मोर तैयार किया था।

तेनाली राम चार और मोर लेकर उस चित्रकार के पास पहुँचा। उसने उन्हें लाल रंग से रंगवा कर तैयार कराया और उसी दिन उन्हें दरबार में ले जाकर राजा से कहा, ‘‘महाराज हमारे मित्र दरबारी ने पच्चीस हजार से केवल एक लाल मोर ही मंगवाया था और मैं सिर्फ पचास हजार में उससे भी अधिक सुन्दर चार लाल मोर ले आया हूं।’’

राजा ने देखा। सचमुच तेनाली राम के चारों मोर उस दरबारी वाले मोर से कहीं अधिक सुन्दर और सुर्ख लाल रंग के थे।

राजा को आज्ञा देनी पड़ी, ‘‘तेनाली राम को राजकोष से पचास हजार रुपये फौरन दे दिए जाएं।’’
राजा कृष्णदेव राय की यह आज्ञा सुनते ही तेनाली राम ने एक आदमी की ओर इशारा करते हुए राजा से कहा, ‘‘महाराज, पुरस्कार का सही अधिकारी यही कलाकार है, मैं नहीं हूं। यह आदमी एक अनोखा चित्रकार है। यह किसी भी वस्तु का रंग बदलने की कला में निपुण है। इसी ने नीले मोरों का रंग लाल करने की कला दिखाई है।’’

अब राजा को सारा गोरखधन्धा समझते देर नहीं लगी। वह समझ गए कि पहले दिन दरबारी ने उन्हें मूर्ख बनाकर रुपये ठगे थे।

राजा ने फौरन ही उस दरबारी पर पच्चीस हजार लौटाने के साथ ही पांच हजार रुपये जुर्माने का आदेश दिया और चित्रकार को पुरस्कृत किया।

दरबारी बेचारा क्या करता! वह अपना-सा मुंह लेकर रह गया। राजा कृष्णदेव राय को खुश करने की सनक के चक्कर में पांच हजार रुपये भी गंवाने पड़े।

 

Moral of the Tenali Rama story: कहानी की शिक्षा: आपको धोखा नहीं देना चाहिए।

 

 

 

महामूर्ख – Tenali Rama Story in Hindi – The greatest fool!

In this short hindi Tenali Rama ki kahani, all the courties are very jealous of Tenali Rama since he used to win in the Holi competition every year. The courties try to cheat by making Tenaliram drunk on the day. Despite that, Tenali Rama manages to win by using his precense of mind. Let us now start reading this Tenali Raman short story in Hindi.

 

राजा कृष्णदेव राय होली का उत्सव बड़ी धूमधाम से मनाते थे। होली के दिन मनोविनोद के अनेक कार्यक्रम विजयनगर में होते थे। प्रत्येक कार्यक्रम के सफल कलाकार को पुरस्कार देने की व्यवस्था भी होती थी। सबसे बड़ा तथा सबसे मूल्यवान पुरस्कार ‘महामूर्ख’ की उपाधि पाने वाले को दिया जाता था।

तेनाली राम को हर साल सर्वश्रेष्ठ हास्य कलाकार का पुरस्कार तो मिलता ही था। अपनी चतुराई और बुद्धिमानी के बल पर प्रतिवर्ष ‘महामूर्ख’ भी वही चुना जाता था।

इस तरह तेनाली राम हर वर्ष दो-दो पुरस्कार अकेले हड़प लेता था।

इसी कारण अन्य दरबारियों को प्रतिवर्ष ईर्ष्या की आग में झुलसना पड़ता था।

इस साल अन्य दरबारियों ने फैसला कर लिया था कि इस बार होली के उत्सव पर तेनाली राम का पत्ता ही साफ कर दिया जाए। उसके लिए उन्होंने एक तरकीब भी खोज ली थी।

तेनाली राम के प्रमुख सेवक को पढ़ा-सिखाकर उसके द्वारा तेनाली राम को छककर भंग पिलवा दी गई। होली के दिन इसी कारण तेनाली भंग के नशे की तरंग में घर पर ही पड़ा रहा।

दोपहर बाद जब तेनाली राम की नींद खुली तो वह घबरा गया और इसी घबराहट में भागता-भागता दरबार में पहुंच गया।

जब वह दरबार में पहुंचा, तब तक उत्सव में आधे से अधिक कार्यक्रम सम्पन्न हो चुके थे।
राजा कृष्णदेव राय उसे देखते ही डपटकर बोले-‘‘अरे मूर्ख तेनाली राम जी, आज के दिन भी भंग छानकर सो गये?’’
राजा ने तेनाली राम को मूर्ख कहा तो सारे दरबारी प्रसन्न हो उठे। उन्होंने भी राजा की हां में हां मिलाई और बोले, ‘‘आपने बिल्कुल सत्य ही कहा महाराज। तेनाली राम मूर्ख ही नहीं बल्कि महामूर्ख है।’’

जब तेनाली राम ने सब लोगों के मुंह से यह सुना तो मुस्कराता हुआ महाराज से बोला, ‘धन्यवाद महाराज, आपने अपने श्रीमुख से मुझे महामूर्ख घोषित करके आज के दिन का सबसे बड़ा पुरस्कार तो मेरे लिए सुरक्षित कर ही दिया है।’’

तेनाली राम के मुख से यह सुनते ही दरबारियों को अपनी भूल का पता चल गया।

किन्तु वे अब कर भी क्या सकते थे ? क्योंकि वे स्वयं ही अपने मुख से तेनाली राम को महामूर्ख बता चुके थे।

होली के अवसर पर ‘महामूर्ख’ का पुरस्कार तेनाली राम हर साल की तरह फिर झपट ले गया।

 

Moral of the Tenali Rama story: कहानी की शिक्षा: ईर्ष्या मत करो।

 

 

अंगूठी चोर – Tenali Rama ki kahani –  The king’s ring!

In this short hindi Tenali Rama ki kahani, raja Krishna Deva Raya loses his favorte diamond ring and is very sad. He is sure that one of his 12 guards have stolen it. Tenali Rama offers to find out who stole the ring and uses his wits to find the theif. Let us now start reading this Tenali Raman short story in Hindi.

Tenali Raman short stories in Hindi
Tenali Raman short stories in Hindi

महाराजा कृष्ण देव राय एक कीमती रत्न जड़ित अंगूठी पहना करते थे। जब भी वह दरबार में उपस्थित होते तो अक्सर उनकी नज़र अपनी सुंदर अंगूठी पर जाकर टिक जाती थी। राजमहल में आने वाले मेहमानों और मंत्रीगणों से भी वह बार-बार अपनी उस अंगूठी का ज़िक्र किया करते थे।

एक बार राजा कृष्ण देव राय उदास हो कर अपने सिंहासन पर बैठे थे। तभी तेनालीराम वहाँ आ पहुंचे। उन्होने राजा की उदासी का कारण पूछा। तब राजा ने बताया कि उनकी पसंदीदा अंगूठी खो गयी है, और उन्हे पक्का शक है कि उसे उनके बारह अंग रक्षकों में से किसी एक ने चुराया है।

चूँकि राजा कृष्ण देव राय का सुरक्षा घेरा इतना चुस्त होता था की कोई चोर-उचक्का या सामान्य व्यक्ति उनके नज़दीक नहीं जा सकता था। तेनालीराम ने तुरंत महाराज से कहा कि-
मैं अंगूठी चोर को बहुत जल्द पकड़ लूँगा।

यह बात सुन कर राजा कृष्ण देव राय बहुत प्रसन्न हुए। उन्होने तुरंत अपने अंगरक्षकों को बुलवा लिया।

तेनालीराम बोले, “राजा की अंगूठी आप बारह अंगरक्षकों में से किसी एक ने की है। लेकिन मैं इसका पता बड़ी आसानी से लगा लूँगा। जो सच्चा है उसे डरने की कोई ज़रुरत नहीं और जो चोर है वह कठोर दण्ड भोगने के लिए तैयार हो जाए।”

तेनालीराम ने बोलना जारी रखा, “आप सब मेरे साथ आइये हम सबको काली माँ के मंदिर जाना है।”
राजा बोले, ” ये कर रहे हो तेनालीराम हमें चोर का पता लगाना है मंदिर के दर्शन नहीं कराने हैं!”
“महाराज, आप धैर्य रखिये जल्द ही चोर का पता चल जाएगा।”, तेनालीराम ने राजा को सब्र रखने को कहा।

मंदिर पहुँच कर तेनालीराम पुजारी के पास गए और उन्हें कुछ निर्देश दिए। इसके बाद उन्होंने अंगरक्षकों से कहा, ” आप सबको बारी-बारी से मंदिर में जा कर माँ काली की मूर्ति के पैर छूने हैं और फ़ौरन बाहर निकल आना है। ऐसा करने से माँ काली आज रात स्वप्न में मुझे उस चोर का नाम बता देंगी।

अब सारे अंगरक्षक बारी-बारी से मंदिर में जा कर माता के पैर छूने लगे। जैसे ही कोई अंगरक्षक पैर छू कर बाहर निकलता तेनालीराम उसका हाथ सूंघते आर एक कतार में खड़ा कर देते। कुछ ही देर में सभी अंगरक्षक एक कतार में खड़े हो गए।

महाराज बोले, “चोर का पता तो कल सुबह लगेगा, तब तक इनका क्या किया जाए?”
नहीं महाराज, चोर का पता तो ला चुका है। सातवें स्थान पर खड़ा अंगरक्षक ही चोर है।

ऐसा सुनते ही वह अंगरक्षक भागने लगा, पर वहां मौजूद सिपाहियों ने उसे धर दबोचा, और कारागार में डाल दिया.

राजा और बाकी सभी लोग आशार्यचाकित थे कि तेनालीराम ने बिना स्वप्न देखे कैसे पता कर लिया कि चोर वही है।

तेनालीराम सबकी जिज्ञासा शांत करते हुए बोले,”मैंने पुजारी जी से कह कर काली माँ के पैरों पर तेज सुगन्धित इत्र छिड़कवा दिया था। जिस कारण जिसने भी माँ के पैर छुए उसके हाथ में वही सुगन्ध आ गयी। लेकिन जब मैंने सातवें अंगरक्षक के हाथ महके तो उनमे कोई खुशबु नहीं थी… उसने पकड़े जाने के डर से माँ काली की मूर्ति के पैर छूए ही नहीं। इसलिए यह साबित हो गया की उसी के मन में पाप था और वही चोर है।”

राजा कृष्ण देव राय एक बार फिर तेनालीराम की बुद्धिमत्ता के कायल हो गए। और उन्हें स्वर्ण मुद्राओं से सम्मानित किया।

 

Moral of the Tenali Rama story: कहानी की शिक्षा: चोरी मत करो

 

 

जादूगर का घमंड – Tenali Raman stories in Hindi – The arrogant magician

In this Hindi Tenali Raman Story, a magician is very arrogant and tries to show off infront of the king and the courties. Tenali Ramakrishna teaches him a lesson in humility by tricking the magician and making him lose in his own challenge.

 

एक बार राजा कृष्ण देव राय के दरबार में एक जादूगर आया। उसने बहुत देर तक हैरतअंगेज़ जादू करतब दिखा कर पूरे दरबार का मनोरंजन किया। फिर जाते समय राजा से ढेर सारे उपहार ले कर अपनी कला के घमंड में सबको चुनौती दे डाली-

क्या कोई व्यक्ति मेरे जैसे अद्भुत करतब दिखा सकता है। क्या कोई मुझे यहाँ टक्कर दे सकता है?

इस खुली चुनौती को सुन कर सारे दरबारी चुप हो गए। परंतु तेनालीराम को इस जादूगर का यह अभिमान अच्छा नहीं लगा। वह तुरंत उठ खड़े हुए और बोले कि हाँ मैं तुम्हे चुनौती देता हूँ कि जो करतब मैं अपनी आँखें बंद कर के दिखा दूंगा वह तुम खुली आंखो से भी नहीं कर पाओगे। अब बताओ क्या तुम मेरी चुनौती स्वीकार करते हो?

जादूगर अपने अहम में अंध था। उसने तुरंत इस चुनौती को स्वीकार कर लिया।

तेनालीराम ने रसोइये को बुला कर उस के साथ मिर्ची का पाउडर मंगवाया। अब तेनालीराम ने अपनी आँखें बंद की और उनपर एक मुट्ठी मिर्ची पाउडर डाल दिया। फिर थोड़ी देर में उन्होंने मिर्ची पाउडर झटक कर कपड़े से आँखें पोंछ कर शीतल जल से अपना चेहरा धो लिया। और फिर जादूगर से कहा कि अब तुम खुली आँखों से यह करतब करके अपनी जादूगरी का नमूना दिखाओ।
घमंडी जादूगर को अपनी गलती समझ आ गयी। उसने माफी मांगी और हाथ जोड़ कर राजा के दरबार से चला गया।

राजा कृष्ण देव राय अपने चतुर मंत्री तेनालीराम की इस युक्ति से अत्यंत प्रभावित हुए। उन्होने तुरंत तेनालीराम को पुरस्कार दे कर सम्मानित किया और राज्य की इज्जत रखने के लिए धन्यवाद दिया।

 

 

कुछ नहीं – Tenali Rama ki kahani – The box full of nothing

In this Hindi Tenali Raman Story, a fruit merchant does not like Tenali Raman and puts him in a very tricky spot by asking for something impossible. Tenali Ramakrishna uses his wits and intelligence to trick the fruit seller and escape.

 

तेनालीराम राजा कृष्ण देव राय के निकट होने के कारण बहुत से लोग उनसे जलते थे। उनमे से एक था रघु नाम का ईर्ष्यालु फल व्यापारी। उसने एक बार तेनालीराम को षड्यंत्र में फसाने की युक्ति बनाई। उसने तेनालीराम को फल खरीदने के लिए बुलाया। जब तेनालीराम ने उनका दाम पूछा तो रघु मुस्कुराते हुए बोला,

“आपके लिए तो इनका दाम ‘कुछ नहीं’ है।”

यह बात सुन कर तेनालीराम ने कुछ फल खाए और बाकी थैले में भर आगे बढ़ने लगे। तभी रघु ने उन्हें रोका और कहा कि मेरे फल के दाम तो देते जाओ।

तेनालीराम रघु के इस सवाल से हैरान हुए, वह बोले कि अभी तो तुमने कहा की फल के दाम ‘कुछ नहीं’ है। तो अब क्यों अपनी बात से पलट रहे हो। तब रघु बोला की, मेरे फल मुफ्त नहीं है। मैंने साफ-साफ बताया था की मेरे फलों का दाम कुछ नहीं है। अब सीधी तरह मुझे ‘कुछ नहीं’ दे दो, वरना मै राजा कृष्ण देव राय के पास फरियाद ले कर जाऊंगा और तुम्हें कठोर दंड दिलाऊँगा।
तेनालीराम सिर खुझाने लगे। और यह सोचते-सोचते वहाँ से अपने घर चले गए।
उनके मन में एक ही सवाल चल रहा था कि इस पागल फल वाले के अजीब षड्यंत्र का तोड़ कैसे खोजूँ। इसे कुछ नहीं कहाँ से लाकर दूँ।

अगले ही दिन फल वाला राजा कृष्ण देव राय के दरबार में आ गया और फरियाद करने लगा। वह बोला की तेनाली ने मेरे फलों का दाम ‘कुछ नहीं’ मुझे नहीं दिया है।

राजा कृष्ण देव राय ने तुरंत तेनालीराम को हाज़िर किया और उससे सफाई मांगी। तेनालीराम पहले से तैयार थे उन्होंने एक रत्न-जड़ित संदूक लाकर रघु फल वाले के सामने रख दिया और कहा ये लो तुम्हारे फलों का दाम।

उसे देखते ही रघु की आँखें चौंधिया, उसने अनुमान लगाया कि इस संदूक में बहुमूल्य हीरे-जवाहरात होंगे… वह रातों-रात अमीर बनने के ख्वाब देखने लगा। और इन्ही ख़यालों में खोये-खोये उसने संदूक खोला।

संदूक खोलते ही मानो उसका खाब टूट गया, वह जोर से चीखा, “ये क्या? इसमें तो ‘कुछ नहीं’ है!”

तब तेनालीराम बोले, “बिलकुल सही, अब तुम इसमें से अपना ‘कुछ नहीं’ निकाल लो और यहाँ से चलते बनो।”

वहां मौजूद महाराज और सभी दरबारी ठहाका लगा कर हंसने लगे। और रघु को अपना सा मुंह लेकर वापस जाना पड़ा। एक बार फिर तेनालीराम ने अपने बुद्धि चातुर्य से महाराज का मन जीत लिया था।

 

 

बाबापुर की रामलीला – Tenali Raman Stories in Hindi – Ramlila from Babpur

In this achi kahaniyan from the tales of Tenali Raman, the drama troupe has suddenly gotten sick and they cannot perform the Ramlila for Dusshera festival. Raja Krishna deva raya is very upset since it is a very important part of Dusshera. Tenali Raman saves the day by using his skills and also manges to impress the king.

Tenali Raman stories in Hindi with moral
Tenali Raman stories in Hindi with moral

हर वर्ष दशहरे से पूर्व काशी की नाटक मंडली विजयनगर आती थी। सामान्यतः वे राजा कृष्णदेव राय तथा विजयनगर की प्रजा के लिए रामलीला किया करते थे। परंतु एक बार राजा को सूचना मिली कि नाटक मंडली विजयनगर नहीं आ रही है। इसका कारण यह था कि नाटक मंडली के कई सदस्य बीमार हो गए थे।

 

यह सूचना पाकर राजा बहुत दुःखी हुए, क्योंकि दशहरे में अब कुछ ही दिन बाकी थे। इतने कम दिनों में दूसरी नाटक मंडली की भी व्यवस्था नहीं की जा सकती थी। पास में दूसरी कोई नाटक मंडली नहीं होने के कारण इस वर्ष रामलीला होने के आसार दिखाई नहीं पड़ रहे थे जबकि दशहरे से पूर्व रामलीला होना विजयनगर की पुरानी संस्कृति थी। महाराज को इस तरह दुःखी देखकर राजगुरु बोले, ‘महाराज, यदि चाहें तो हम रामपुर के कलाकारों को संदेश भेज सकते हैं?’

‘परंतु, इसमें तो कुछ सप्ताह का समय लगेगा’, राजा ने निराश स्वर में कहा।

इस पर तेनालीराम बोले, ‘महाराज, मैं पास ही की एक मंडली को जानता हूं, वे यहां दो दिन में आ जाएंगे और मुझे विश्वास है कि वे रामलीला का अच्छा प्रदशन करेंगे।

 

यह सुनकर राजा प्रसन्न हो गए और तेनालीराम को मंडली को बुलाने की जिम्मेदारी सौंप दी गई, साथ ही मंडली के रहने व खाने-पीने की व्यवस्था का भार भी तेनाली के ही सुपुर्द कर दिया गया। शीघ्र ही रामलीला के लिए सारी व्यवस्था होनी शुरू हो गई। रामलीला मैदान को साफ किया गया। एक बड़ा-सा मंच बनाया गया। नवरात्र के लिए नगर को सजाया गया।

 

रामलीला देखने के लिए लोग बहुत उत्सुक थे, क्योंकि इसके पूर्व काशी की नाटक मंडली के न आने की सूचना से वे काफी दुःखी थे, परंतु अब नई नाटक मंडली के आने की सूचना से उनका उत्साह् दोगुना हो गया था। महल के निकट एक मेला भी लगाया गया था।

 

कुछ ही दिनों में मंडली रामलीला के लिए तैयार हो गई। राजा, दरबारी, मंत्री व प्रजा प्रतिदिन रामलीला देखने आते। दशहरे के दिन की अंतिम कड़ी तो बहुत ही सराहनीय थी। मंडली में अधिकतर कलाकार बच्चे थे। उनकी कलाकारी देखकर लोगों की आंखों में आंसू तक आ गए।

 

दशहरे के पश्चात राजा ने कुछ मंत्रियों तथा मंडली के सदस्यों को महल में भोजन के लिए बुलाया। भोजन के पश्चात राजा ने मंडली के सदस्यों को पुरस्कार दिया। फिर वे तेनालीराम से बोले, ‘तुम्हें इतनी अच्छी मंडली कैसे मिली?’

‘बाबापुर से महाराज,’ तेनालीराम ने उत्तर दिया।

‘बाबापुर! यह कहां है? मैंने इसके विषय में कभी नहीं सुना’, राजा ने आश्चर्य से पूछा।

‘बाबापुर विजयनगर के पास ही है, महाराज।’ तेनालीराम बोला।

 

तेनालीराम की बात सुनकर मंडली के कलाकार मुस्करा दिए। राजा ने उनसे उनके इस प्रकार मुस्कराने का कारण पूछा तो मंडली का एक छोटा बालक सदस्य बोला, ‘महाराज, वास्तव में हम लोग विजयनगर से ही आए हैं। तेनाली बाबा ने तीन दिन में हमें यह नाटक करना सिखाया था इसलिए इसे हम बाबापुर की रामलीला कहते हैं।’

यह सुनकर राजा भी खिलखिलाकर हंस पड़े। अब उन्हें भी बाबापुर के रहस्य का पता चल गया था।

 

 

बेशकीमती फूलदान – Tenali Ramakrishna Stories in Hindi – The broken vase

In this beautiful Tenali Rama kahaniya, Raja Krishnadevaraya gets very angry with one of his servants since he broke a vase. His anger is so terrible that he orders the servant to be hanged. The poor servant asks Tenali Raman for help since he is innocent and it was only an accident. Tenali Raman saves the servant by using his wit and intelligence also teaches the king a lesson. Let us continue reading the Tenali Raman Stories in Hindi.

 

विजयनगर का वार्षिक उत्सव बहुत ही धूमधाम से बनाया जाता था। जिसमें आसपास के राज्यों के राजा भी महाराज के लिए बेशकीमती उपहार लेकर सम्मिलित होते थे। हर बार की तरह इस बार भी महाराज को बहुत से उपहार मिले। सारे उपहार में महाराज को रत्नजड़ित रंग – बिरंगे चार फूलदान बहुत ही पसंद आए। महाराज ने उन फूलदानों को अपने विशेष कक्ष में रखवाया और उन फूलदानों की रखवाली के लिए एक सेवक भी रख लिया। सेवक रमैया बहुत ही ध्यान से उन फूलदानों की रखवाली करता था क्योंकि उसे ये काम सौंपने से पहले ही बता दिया गया था कि अगर उन फूलदानों को कोई भी नुकसान पहुंचा तो उसे अपनी जान से हाथ धोना पड़ेगा।

एक दिन रमैया बहुत ही सावधानी से उन फूलदानों की सफाई कर रहा था कि अचानक उसके हाथ से एक फूलदान छूटकर ज़मीन पर गिरकर चकनाचूर हो गया। जैसे ही महाराज को ये बात पता चली तो उन्होंने चार दिन बाद रमैया को फांसी देना का आदेश सुना डाला। महाराज का ये आदेश सुनते ही तेनालीराम महाराज के पास आया और बोला, “महाराज एक फूलदान के टूट जाने पर आप अपने इतने पुराने सेवक को मृत्युदंड कैसे दे सकते हैं ? ये तो सरासर नाइंसाफी है।”

परन्तु महाराज उस समय बहुत ही गुस्से में थे इसलिए उन्होंने तेनालीराम की बात पर विचार करना ज़रूरी नहीं समझा। जब महाराज नहीं समझे तो तेनालीराम रमैया के पास गया और उससे बोला, “ तुम चिंता मत करो।अब मैं जो कहूँ तुम उसे ध्यान से सुनना और फांसी से पहले तुम वैसा ही करना। मैं यकीन दिलाता हूँ कि तुम्हें कुछ नहीं होगा।” रमैया ने तेनालीराम की सारी बात बड़े ही ध्यान से सुनी और बोला ,“मैं ऐसा ही करूँगा।” फांसी का दिन आ गया। फांसी के समय महाराज भी वहाँ उपस्थित थे। फांसी देने से पहले रमैया से उसकी अंतिम इच्छा पूछी गई। तब रमैया बोला,” मैं एक बार बचे हुए तीन फूलदानों को एक बार देखना चाहता हूँ जनकी वजह से मुझे फांसी पर लटकाया जा रहा है।” रमैया की अंतिम इच्छा के अनुसार महाराज ने उन तीन फूलदानों को लाने का आदेश दिया।

अब जैसे ही फूलदान रमैया के सामने आए तो उसने तेनालीराम के कहे अनुसार तीनों फूलदानों को ज़मीन पर गिराकर तोड़ दिया। रमैया के फूलदान तोड़ते ही महाराज गुस्से से आग-बबूला हो गए और चिल्लाकर बोले, “ ये तुमने क्या किया आखिर तुमने इन्हें क्यों तोड़ डाला।” रमैया बोला, “महाराज आज एक फूलदान टूटा है तो मुझे फांसी दी जा रही है। ऐसे ही जब ये तीनों भी टूटेंगे तो तीन और लोगों को मृत्युदंड दिया जाएगा। मैंने इन्हें तोडकर तीन लोगों की जान बचा ली है क्योंकि फूलदान इंसानों की जान से ज्यादा कीमती कुछ नहीं हो सकता।”

रमैया की बात सुनकर महाराज का गुस्सा शांत हो गया और उन्होंने रमैया को भी छोड़ दिया। फिर उन्होंने रमैया से पूछा, “तुमने ये सब किसके कहने पर किया था।” रमैया ने सब सच-सच बता दिया। तब महाराज ने तेनालीराम को अपने पास बुलाया और बोले, “आज तुमने एक निर्दोष की जान बचा ली और हमें भी यह बतला दिया कि गुस्से में लिए गए फैसले हमेशा गलत होते हैं। तेनालीराम तुम्हारा बहुत बहुत शुक्रिया।”

 

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